श्री गोवर्धन जी की आरती (Shri Govardhan Ji Ki Aarti)
‘गोवर्धन’ शब्द का भावार्थ गायों का पालन-पोषण और संवर्धन करने वाला भी माना जाता है। ब्रजभूमि में गायों, गोप-गोपियों और प्रकृति के साथ गोवर्धन पर्वत का विशेष संबंध है। भगवान श्रीकृष्ण ने इसी पर्वत को अपनी कनिष्ठा उंगली पर उठाकर ब्रजवासियों को इंद्र के प्रकोप से बचाया था। इसी कारण श्रीकृष्ण को गिरिधारी और गोवर्धनधारी कहा जाता है।
🪔॥ आरती ॥🪔
श्री गोवर्धन महाराज, ओ महाराज,
तेरे माथे मुकुट विराज रहेयो।
श्री गोवर्धन महाराज, ओ महाराज,
तेरे माथे मुकुट विराज रहेयो॥
तोपे पान चढ़े, तोपे फूल चढ़े,
तोपे चढ़े दूध की धार ।
श्री गोवर्धन महाराज, ओ महाराज,
तेरे माथे मुकुट विराज रहेयो॥
तेरे गले में कंठा साज रहेयो,
ठोड़ी पे हीरा लाल ।
श्री गोवर्धन महाराज, ओ महाराज,
तेरे माथे मुकुट विराज रहेयो॥
तेरे कानन कुंडल चमक रहेयो,
तेरी झांकी बनी विशाल ।
श्री गोवर्धन महाराज, ओ महाराज,
तेरे माथे मुकुट विराज रहेयो॥
तेरी सात कोस की परिकम्मा,
चकलेश्वर है विश्राम ।
श्री गोवर्धन महाराज, ओ महाराज,
तेरे माथे मुकुट विराज रहेयो॥
गिरिराज धरण प्रभु तेरी शरण,
करो भक्त का बेड़ा पार।
श्री गोवर्धन महाराज, ओ महाराज,
तेरे माथे मुकुट विराज रहेयो॥
॥ इति संपूर्णंम् ॥
📖 संबंधित जानकारी
- आरती का नाम: श्री गोवर्धन महाराज की आरती
- पूज्य स्वरूप: गिरिराज गोवर्धन
- आराध्य देव: भगवान श्रीकृष्ण
- भाषा: ब्रजभाषा
- प्रमुख पर्व: गोवर्धन पूजा और अन्नकूट
- विशेष अवसर: कार्तिक मास, गोवर्धन परिक्रमा और श्रीकृष्ण की पूजा
- प्रमुख स्थान: गोवर्धन, मथुरा, उत्तर प्रदेश
गोवर्धन पर्वत को ब्रजभूमि का पवित्र और पूजनीय स्वरूप माना जाता है। भक्त गिरिराज महाराज की पूजा करके भगवान श्रीकृष्ण के प्रति अपनी श्रद्धा प्रकट करते हैं। इस आरती में गोवर्धन जी के दिव्य श्रृंगार, उनकी परिक्रमा और भक्तों की रक्षा करने वाली गोवर्धन लीला का स्मरण किया जाता है।
🙏 श्री गोवर्धन जी की आरती का हिंदी भावार्थ
1. श्री गोवर्धन महाराज, ओ महाराज, तेरे माथे मुकुट विराज रह्यो॥
हे गिरिराज महाराज! आप दिव्य और अलौकिक स्वरूप वाले हैं। आपके मस्तक पर सुंदर मुकुट सुशोभित है। भक्त प्रेमपूर्वक आपके इस राजसी स्वरूप का गुणगान करते हैं।
2. तोपे पान चढ़े, तोपे फूल चढ़े, तोपे चढ़े दूध की धार॥
हे गोवर्धन महाराज! भक्त आपको पान, सुंदर पुष्प और दूध की धारा अर्पित करते हैं। इन पूजन सामग्रियों के माध्यम से वे आपके प्रति अपना प्रेम, श्रद्धा और समर्पण प्रकट करते हैं।
3. तेरी सात कोस की परिकम्मा, और चकलेश्वर विश्राम॥
हे गिरिराज जी! आपकी सात कोस की पवित्र परिक्रमा की जाती है। इस यात्रा में चकलेश्वर महादेव जैसे पवित्र स्थानों पर भक्त विश्राम करते हैं और दर्शन करते हैं।
4. तेरे गले में कण्ठा साज रह्यो, ठोड़ी पे हीरा लाल॥
हे महाराज! आपके गले में सुंदर कंठा और ठोड़ी पर हीरे-माणिक्य जैसे बहुमूल्य रत्न सुशोभित हैं। आपका दिव्य श्रृंगार भक्तों के मन को आनंदित करता है।
5. तेरे कानन कुण्डल चमक रह्यो, तेरी झाँकी बनी विशाल॥
आपके कानों में सुंदर कुंडल चमक रहे हैं। आपका भव्य और मनमोहक स्वरूप भक्तों को दर्शन का आनंद प्रदान करता है।
6. गिरिराज धरण प्रभु तेरी शरण, करो भक्त का बेड़ा पार॥
हे गिरिराज को धारण करने वाले प्रभु श्रीकृष्ण! हम आपकी शरण में आए हैं। हमारी कठिनाइयों को दूर करके हमें जीवन के दुखों और संकटों से पार लगाइए।
📜 पौराणिक कथा – भगवान श्रीकृष्ण ने गोवर्धन पर्वत क्यों उठाया?
प्राचीन समय में ब्रजभूमि के निवासी वर्षा के देवता इंद्र की पूजा किया करते थे। उनका विश्वास था कि इंद्र देव की कृपा से वर्षा होती है और फसलें अच्छी होती हैं।
एक बार बालक श्रीकृष्ण ने ब्रजवासियों से पूछा कि वे इंद्र देव की पूजा क्यों करते हैं। श्रीकृष्ण ने समझाया कि मनुष्य को उन प्राकृतिक साधनों और जीवों के प्रति कृतज्ञ रहना चाहिए जो उसके जीवन का पालन-पोषण करते हैं। गोवर्धन पर्वत ब्रजवासियों को घास, जल और गायों के लिए भोजन उपलब्ध कराता है। इसलिए उसकी पूजा करना उचित है।
श्रीकृष्ण की बात मानकर नंद बाबा और सभी ब्रजवासियों ने इंद्र पूजा के स्थान पर गोवर्धन पर्वत की पूजा की और अनेक प्रकार के पकवानों का भोग लगाया। इस उत्सव को अन्नकूट कहा गया। जब इंद्र देव को यह पता चला तो वे क्रोधित हो गए। उन्होंने ब्रजभूमि में भयंकर वर्षा और तूफान भेज दिया। चारों ओर जल भरने लगा और ब्रजवासी भयभीत हो उठे।
अपने भक्तों और गायों की रक्षा के लिए भगवान श्रीकृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को अपनी छोटी उंगली पर उठा लिया। सभी ब्रजवासी, गोप-गोपियाँ और गायें पर्वत के नीचे सुरक्षित आश्रय लेने लगे। लगातार सात दिनों तक श्रीकृष्ण ने पर्वत को धारण किए रखा। अंत में इंद्र देव को अपनी भूल का एहसास हुआ। उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण से क्षमा माँगी और उनका अभिमान समाप्त हुआ। इस प्रकार भगवान ने ब्रजवासियों की रक्षा की और संसार को सिखाया कि अहंकार का त्याग करके प्रकृति और उसके पालनहार के प्रति कृतज्ञ रहना चाहिए।
तभी से गोवर्धन पर्वत की पूजा और अन्नकूट उत्सव की परंपरा विशेष श्रद्धा के साथ मनाई जाती है।
🪔 श्री गोवर्धन जी की पूजा विधि
गोवर्धन पूजा के दिन भक्त श्रद्धा और भक्ति के साथ गिरिराज महाराज की पूजा करते हैं। घर पर भी सरल विधि से पूजा की जा सकती है।
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प्रातःकाल स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
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पूजा स्थल को साफ करके भगवान श्रीकृष्ण और गोवर्धन महाराज का चित्र या प्रतिमा स्थापित करें।
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गोबर या मिट्टी से गोवर्धन पर्वत का प्रतीकात्मक स्वरूप बनाएँ। उसे फूलों और पत्तियों से सजाएँ।
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रोली, अक्षत, पुष्प, धूप और दीप अर्पित करें।
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दूध, दही, घी, शहद, मिठाई और अन्नकूट का भोग लगाएँ।
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गोवर्धन जी के मंत्रों का जाप करें।
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श्रद्धापूर्वक श्री गोवर्धन महाराज की आरती गाएँ।
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परिवार के साथ गोवर्धन जी की सात बार परिक्रमा करें, यदि यह संभव हो।
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अंत में भगवान श्रीकृष्ण और गिरिराज महाराज से परिवार की सुख-शांति और मंगल की प्रार्थना करें।
🌼 श्री गोवर्धन जी की पूजा सामग्री
गोवर्धन महाराज की पूजा में निम्नलिखित सामग्री का उपयोग किया जा सकता है:
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गोबर से गोवर्धन पर्वत बनाने के लिए
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श्रीकृष्ण और गोवर्धन जी का चित्र या प्रतिमा
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रोली, चंदन और अक्षत
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ताजे फूल और तुलसी दल
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पान और सुपारी
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दूध, दही, घी और शहद
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फल और मिठाइयाँ
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अन्नकूट का प्रसाद
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धूप, दीप और कपूर
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घी और रुई की बत्ती
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जल से भरा कलश
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आरती की थाली और घंटी
🕉️ श्री गोवर्धन जी के मंत्र
1. गोवर्धन महाराज का सरल मंत्र
ॐ श्री गोवर्धनाय नमः॥
2. गिरिराज जी का मंत्र
ॐ गिरिराजाय नमः॥
3. भगवान श्रीकृष्ण का मंत्र
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय॥
4. श्रीकृष्ण गोवर्धनधारी मंत्र
ॐ गोवर्धनधराय नमः॥
भक्त पूजा के समय इनमें से किसी भी मंत्र का श्रद्धापूर्वक जाप कर सकते हैं।
🌺 श्री गोवर्धन जी की आरती का महत्व
हिंदू धर्म में गोवर्धन पूजा का विशेष धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व है। यह पर्व भगवान श्रीकृष्ण की गोवर्धन लीला और प्रकृति के प्रति सम्मान का संदेश देता है।
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श्रीकृष्ण की भक्ति: गोवर्धन महाराज की पूजा भगवान श्रीकृष्ण के प्रति प्रेम और समर्पण प्रकट करने का माध्यम है।
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प्रकृति का सम्मान: यह पर्व पर्वत, वन, जल, भूमि और पशुधन के महत्व को समझाता है।
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गौ-सेवा का संदेश: गोवर्धन लीला में गायों और ब्रज के पशुधन की रक्षा का विशेष प्रसंग आता है।
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अन्नकूट की परंपरा: भगवान को अनेक प्रकार के पकवान अर्पित करके अन्न के प्रति कृतज्ञता व्यक्त की जाती है।
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शरणागति का भाव: आरती की अंतिम पंक्तियाँ भक्त को भगवान की शरण में रहने और उनसे कृपा की प्रार्थना करने की प्रेरणा देती हैं।
🙏 श्री गोवर्धन जी की आरती करने के लाभ
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, श्रद्धापूर्वक गोवर्धन महाराज की आरती करने से भक्त को आध्यात्मिक शांति और श्रीकृष्ण की कृपा का अनुभव होता है।
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मन में भक्ति, श्रद्धा और सकारात्मकता का भाव बढ़ता है।
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परिवार में सुख-शांति और मंगल की कामना की जाती है।
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भक्त भगवान श्रीकृष्ण की गोवर्धन लीला का स्मरण करते हैं।
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प्रकृति, गौवंश और अन्न के प्रति कृतज्ञता का भाव विकसित होता है।
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कठिन समय में भगवान की शरण और उनके संरक्षण पर विश्वास मजबूत होता है।
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परिवार के सदस्यों में सेवा, दया और परोपकार की भावना बढ़ती है।
ये लाभ धार्मिक आस्था और परंपराओं से जुड़े हैं; इन्हें किसी निश्चित भौतिक परिणाम की गारंटी नहीं समझना चाहिए।
🕰️ श्री गोवर्धन जी की आरती का सही समय
गोवर्धन महाराज की आरती किसी भी दिन श्रद्धापूर्वक की जा सकती है। फिर भी कुछ अवसर विशेष माने जाते हैं:
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गोवर्धन पूजा: दीपावली के अगले दिन कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा को।
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अन्नकूट उत्सव: भगवान श्रीकृष्ण को छप्पन भोग और अनेक प्रकार के पकवान अर्पित करते समय।
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कार्तिक मास: इस पवित्र महीने में गोवर्धन जी का स्मरण और पूजा विशेष रूप से की जाती है।
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प्रातःकाल: स्नान और दैनिक पूजा के बाद।
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सायंकाल: दीप प्रज्वलित करके संध्या आरती के समय।
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गोवर्धन परिक्रमा: गिरिराज जी की परिक्रमा के दौरान भी भक्त इस आरती का गायन करते हैं।
गोवर्धन पूजा की तिथि और पूजा का मुहूर्त हर वर्ष पंचांग के अनुसार देखना चाहिए।
🌿 प्रेरणादायक संदेश
श्री गोवर्धन जी की आरती हमें सिखाती है कि सच्ची शक्ति अहंकार में नहीं, बल्कि सेवा, प्रेम और दूसरों की रक्षा करने में है। भगवान श्रीकृष्ण ने गोवर्धन पर्वत उठाकर अपने भक्तों को यह विश्वास दिलाया कि जो सच्चे मन से प्रभु की शरण में आता है, उसका संरक्षण भगवान अवश्य करते हैं।
हमें भी प्रकृति, गायों, अन्न और जल का सम्मान करना चाहिए। दूसरों की सहायता करनी चाहिए और जीवन में अहंकार के स्थान पर विनम्रता को अपनाना चाहिए। गिरिराज महाराज की कृपा से हमारे मन में भक्ति, जीवन में सदाचार और हृदय में सभी प्राणियों के प्रति करुणा बनी रहे।
❓ श्री गोवर्धन जी की आरती से जुड़े FAQ
1. श्री गोवर्धन जी की आरती कब गाई जाती है?
यह आरती विशेष रूप से गोवर्धन पूजा, अन्नकूट उत्सव, कार्तिक मास और गोवर्धन परिक्रमा के समय गाई जाती है। भक्त इसे प्रतिदिन भी गा सकते हैं।
2. गोवर्धन महाराज कौन हैं?
गोवर्धन महाराज ब्रजभूमि में स्थित पवित्र गोवर्धन पर्वत का पूजनीय स्वरूप हैं। वैष्णव परंपरा में उन्हें भगवान श्रीकृष्ण का स्वरूप माना जाता है।
3. गोवर्धन पूजा क्यों मनाई जाती है?
यह पर्व भगवान श्रीकृष्ण द्वारा गोवर्धन पर्वत उठाकर ब्रजवासियों और गायों की रक्षा करने की लीला की स्मृति में मनाया जाता है।
4. गोवर्धन पर्वत को भगवान श्रीकृष्ण ने कितने दिनों तक उठाया था?
श्रीमद्भागवत की प्रसिद्ध गोवर्धन लीला के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण ने लगातार सात दिनों तक गोवर्धन पर्वत को अपनी छोटी उंगली पर धारण किया था।
5. गोवर्धन पूजा में अन्नकूट क्यों चढ़ाया जाता है?
अन्नकूट में अनेक प्रकार के पकवान और खाद्य पदार्थ भगवान को अर्पित किए जाते हैं। यह परंपरा गोवर्धन लीला और अन्न के प्रति कृतज्ञता से जुड़ी है।
6. गोवर्धन जी की सात कोस की परिक्रमा का क्या महत्व है?
गोवर्धन परिक्रमा को भक्त एक पवित्र धार्मिक यात्रा मानते हैं। परिक्रमा के दौरान वे गिरिराज महाराज का स्मरण करते हैं और विभिन्न पवित्र स्थलों के दर्शन करते हैं।
7. क्या घर पर गोवर्धन जी की पूजा की जा सकती है?
हाँ, घर में गोबर या मिट्टी से गोवर्धन पर्वत का प्रतीकात्मक स्वरूप बनाकर अथवा भगवान के चित्र के सामने सरल विधि से पूजा की जा सकती है।
8. गोवर्धन जी की पूजा में कौन-सा मंत्र बोलना चाहिए?
भक्त सरल मंत्र “ॐ श्री गोवर्धनाय नमः॥” या “ॐ गिरिराजाय नमः॥” का जाप कर सकते हैं।
9. गोवर्धन जी की आरती में किस भाषा का प्रयोग हुआ है?
यह आरती मुख्य रूप से ब्रजभाषा में प्रचलित है। इसके शब्दों में ब्रज क्षेत्र की लोकभक्ति और परंपरा की झलक मिलती है।
10. गोवर्धन जी की आरती के बाद कौन-सा जयघोष करना चाहिए?
आरती के बाद “श्री गोवर्धन महाराज की जय”, “गिरिराज धरण की जय” और “श्री कृष्ण कन्हैया लाल की जय” का जयघोष किया जा सकता है।
🚩 श्री गोवर्धन महाराज के जयघोष
॥ श्री गोवर्धन महाराज की जय ॥🪔
॥ गिरिराज धरण प्रभु की जय ॥🌼
॥ जय श्री राधे-कृष्ण ॥🙏
॥ जय श्री गोवर्धन महाराज ॥🕉️
॥ जय गिरिराज धरण ॥🌺
॥ जय श्री कृष्ण गोवर्धनधारी ॥🪔
॥ जय नंदलाल श्री कृष्ण की ॥🕉️
॥ बोलो गिरिराज महाराज की जय ॥🙏