Shri Banke Bihari Teri Aarti Gaun

Shri Banke Bihari Teri Aarti Gaun
श्री बांके बिहारी तेरी आरती गाऊं

श्री बांके बिहारी तेरी आरती गाऊं (Aarti: Shri Banke Bihari Teri Aarti Gaun)

“श्री बाँके बिहारी तेरी आरती गाऊँ” भगवान श्रीकृष्ण के वृंदावन स्थित श्री बाँके बिहारी जी के प्रति प्रेम, समर्पण और भक्ति व्यक्त करने वाली लोकप्रिय आरती है। इसमें भक्त अपने आराध्य बाँके बिहारी जी के सुंदर स्वरूप का ध्यान करते हुए उनकी आरती करने और अपने जीवन को प्रभु के चरणों में समर्पित करने की भावना व्यक्त करता है।

श्री बाँके बिहारी जी भगवान श्रीकृष्ण का अत्यंत मनोहर स्वरूप माने जाते हैं। उनका प्रमुख मंदिर वृंदावन, उत्तर प्रदेश में स्थित है। बाँके बिहारी जी की भक्ति में माधुर्य भाव, प्रेम, वात्सल्य और आत्मसमर्पण का विशेष महत्व है। “बाँके” का भाव भगवान के त्रिभंगी, मनमोहक रूप से और “बिहारी” का संबंध आनंदपूर्वक विहार करने वाले श्रीकृष्ण से जोड़ा जाता है।

॥ आरती ॥

श्री बांके बिहारी तेरी आरती गाऊं,
हे गिरिधर तेरी आरती गाऊं ।
आरती गाऊं प्यारे आपको रिझाऊं,
श्याम सुन्दर तेरी आरती गाऊं ।
॥ श्री बांके बिहारी तेरी आरती गाऊं..॥

मोर मुकुट प्यारे शीश पे सोहे,
प्यारी बंसी मेरो मन मोहे ।
देख छवि बलिहारी मैं जाऊं ।
॥ श्री बांके बिहारी तेरी आरती गाऊं..॥

चरणों से निकली गंगा प्यारी,
जिसने सारी दुनिया तारी ।
मैं उन चरणों के दर्शन पाऊं ।
॥ श्री बांके बिहारी तेरी आरती गाऊं..॥

दास अनाथ के नाथ आप हो,
दुःख सुख जीवन प्यारे साथ आप हो ।
हरी चरणों में शीश झुकाऊं ।
॥ श्री बांके बिहारी तेरी आरती गाऊं..॥

श्री हरीदास के प्यारे तुम हो ।
मेरे मोहन जीवन धन हो।
देख युगल छवि बलि बलि जाऊं ।
॥ श्री बांके बिहारी तेरी आरती गाऊं..॥

श्री बांके बिहारी तेरी आरती गाऊं,
हे गिरिधर तेरी आरती गाऊं ।
आरती गाऊं प्यारे आपको रिझाऊं,
श्याम सुन्दर तेरी आरती गाऊं ।

🙏 जय श्री कृष्ण! 🦚 राधे राधे!

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🌸 हिंदी भावार्थ

इस आरती का मूल भाव है:

🙏 प्रथम अंतरा

श्री बाँके बिहारी तेरी आरती गाऊँ,
हे गिरिधर तेरी आरती गाऊँ।
आरती गाऊँ प्यारे आपको रिझाऊँ,
श्याम सुन्दर तेरी आरती गाऊँ।

सरल भावार्थ

भक्त अपने प्रिय भगवान श्री बाँके बिहारी जी को संबोधित करते हुए कहता है—हे प्रभु! मैं आपकी आरती गाता हूँ। हे गिरिधर, अर्थात गोवर्धन पर्वत को धारण करने वाले श्रीकृष्ण, मैं प्रेमपूर्वक आपकी आरती करता हूँ।

भक्त कहता है कि मेरी आरती केवल एक धार्मिक कर्मकांड नहीं है। मैं इसे प्रेम से आपको प्रसन्न करने और आपके मन को रिझाने के लिए कर रहा हूँ। आप मेरे प्यारे श्यामसुंदर हैं और आपका सुंदर, सांवला स्वरूप मेरे हृदय को अत्यंत प्रिय है।

यहाँ भक्त भगवान को किसी दूर बैठे देवता के रूप में नहीं, बल्कि अपने अत्यंत प्रिय और निकटतम संबंधी के रूप में देखता है।

आध्यात्मिक भाव

इस अंतरे में प्रेम-भक्ति प्रमुख है। भक्त भगवान से किसी भौतिक वस्तु की मांग नहीं करता, बल्कि केवल यह चाहता है कि उसकी आरती और भक्ति प्रभु को प्रिय लगे।

“आपको रिझाऊँ” में बहुत गहरा भाव है—

हे प्रभु! मेरी पूजा में यदि कोई कमी हो तो भी मेरे प्रेम को स्वीकार कर लेना।


🦚 द्वितीय अंतरा

मोर मुकुट प्यारे शीश पे सोहे,
प्यारी बंसी मेरो मन मोहे।
देख छवि बलिहारी मैं जाऊँ।

सरल भावार्थ

भक्त भगवान श्रीकृष्ण के सुंदर स्वरूप का वर्णन करता है। उनके सिर पर सुशोभित मोर मुकुट अत्यंत मनोहर दिखाई देता है। उनके हाथों में रहने वाली प्यारी मुरली (बाँसुरी) भक्त के मन को मोह लेती है।

भगवान की इस मनमोहक छवि को देखकर भक्त इतना भाव-विभोर हो जाता है कि कहता है—मैं इस सुंदर रूप पर बलिहारी जाता हूँ, अर्थात अपना सब कुछ इस दिव्य सौंदर्य के प्रति समर्पित कर देता हूँ।

“मोर मुकुट” का भाव

मोर मुकुट श्रीकृष्ण के वनवासी, सरल और प्राकृतिक स्वरूप की याद दिलाता है। श्रीकृष्ण का श्रृंगार राजसी वैभव से अधिक ब्रज की प्राकृतिक सुंदरता से जुड़ा हुआ दिखाई देता है।

“बंसी मेरो मन मोहे” का भाव

कृष्ण की बाँसुरी को भक्ति परंपरा में अत्यंत सुंदर प्रतीक माना जाता है। बाँसुरी स्वयं खोखली होती है और जब वह पूरी तरह कृष्ण के अधीन होती है, तभी उससे मधुर संगीत निकलता है।

इसी से एक गहरा आध्यात्मिक संदेश लिया जाता है:

जब मनुष्य अपने अहंकार को खाली करके स्वयं को भगवान के हाथों में सौंप देता है, तब उसके जीवन से भी प्रेम और मधुरता प्रकट हो सकती है।

“बलिहारी मैं जाऊँ”

इसका अर्थ केवल प्रशंसा करना नहीं है। इसका भाव है—

हे प्रभु! आपके दर्शन से मैं इतना अभिभूत हूँ कि अपना तन-मन और जीवन आपके चरणों में समर्पित करना चाहता हूँ।


🌊 तृतीय अंतरा

चरणों से निकली गंगा प्यारी,
जिसने सारी दुनिया तारी।
मैं उन चरणों के दर्शन पाऊँ।

सरल भावार्थ

भक्त भगवान के चरणों की महिमा का वर्णन करता है। वह कहता है कि भगवान के चरणों से निकली पवित्र गंगा ने असंख्य जीवों का उद्धार किया और संसार को पवित्र किया।

अब भक्त की सबसे बड़ी इच्छा क्या है?

वह उन्हीं भगवान के पवित्र चरणों के दर्शन प्राप्त करना चाहता है।

यहाँ भक्त संसार की संपत्ति, यश या सुख नहीं मांग रहा। वह केवल प्रभु के चरण-दर्शन की कामना करता है।

यह पंक्ति भग

“चरणों से निकली गंगा” का भाव

वान के चरणों की पवित्रता और महिमा को व्यक्त करती है। वैष्णव परंपरा में गंगा को भगवान विष्णु के चरणों से संबंधित माना जाता है और इसी कारण गंगा को अत्यंत पवित्र माना जाता है।

“जिसने सारी दुनिया तारी”

तारना अर्थात संसार-सागर से पार लगाना या उद्धार करना।

इसका भक्तिपूर्ण भाव है कि भगवान के चरणों का आश्रय मनुष्य को संसार के मोह, भय, अहंकार और दुखों से ऊपर उठने की शक्ति देता है।

“मैं उन चरणों के दर्शन पाऊँ”

यहाँ दर्शन की लालसा दिखाई देती है।

भक्त की प्रार्थना है:

हे प्रभु! मुझे आपके चरणों का दर्शन मिले और मेरा मन संसार की उलझनों से हटकर आपकी भक्ति में लग जाए।


🙏 चतुर्थ अंतरा

दास अनाथ के नाथ आप हो,
दुःख सुख जीवन प्यारे साथ आप हो।
हरि चरणों में शीश झुकाऊँ।

सरल भावार्थ

भक्त स्वयं को भगवान का दास और अनाथ कहता है। इसका अर्थ यह नहीं कि उसका कोई सांसारिक परिवार नहीं है, बल्कि यहाँ वह अपने पूर्ण ईश्वर-आश्रित भाव को व्यक्त करता है।

वह कहता है—

हे प्रभु! जिनका संसार में कोई सहारा नहीं, उनके भी आप ही नाथ हैं। आप ही मेरे सच्चे आश्रय हैं।

जीवन में सुख आए या दुख, भगवान हर परिस्थिति में भक्त के साथ हैं। इसलिए भक्त अंत में अपना सिर भगवान के चरणों में झुका देता है।

“दास अनाथ के नाथ”

यह अत्यंत करुण और समर्पणपूर्ण पंक्ति है।

भक्त स्वीकार करता है:

मैं अपनी शक्ति, बुद्धि और सामर्थ्य पर पूरी तरह निर्भर नहीं हूँ। मेरा वास्तविक आश्रय आप हैं।

“दुःख सुख जीवन प्यारे साथ आप हो”

भक्ति का सुंदर भाव यह है कि भगवान से संबंध केवल सुख के समय का नहीं होना चाहिए।

सुख में भी कृष्ण, दुख में भी कृष्ण।

भक्त कहता है कि जीवन की हर परिस्थिति में प्रभु को अपना साथी मानना है।

“हरि चरणों में शीश झुकाऊँ”

सिर झुकाना अहंकार छोड़ने और समर्पण करने का प्रतीक है।

इसका भाव है:

हे हरि! मेरा अहंकार, मेरी चिंताएँ, मेरा अभिमान और मेरा जीवन—सब आपके चरणों में समर्पित है।


🌺 पंचम अंतरा

श्री हरिदास के प्यारे तुम हो।
मेरे मोहन जीवन धन हो।
देख युगल छवि बलि बलि जाऊँ।

सरल भावार्थ

भक्त श्री बाँके बिहारी जी को श्री हरिदास जी के अत्यंत प्रिय भगवान के रूप में संबोधित करता है। यह पंक्ति बाँके बिहारी जी की भक्ति-परंपरा में स्वामी हरिदास जी के विशेष स्थान की ओर संकेत करती है।

भक्त आगे कहता है—

हे मेरे मोहन! आप ही मेरे जीवन की सबसे बड़ी संपत्ति हैं।

मेरे लिए संसार की धन-दौलत, प्रतिष्ठा और सांसारिक उपलब्धियाँ उतनी महत्वपूर्ण नहीं हैं जितना आपका प्रेम और आपका दर्शन।

जब भक्त भगवान की युगल छवि, अर्थात श्रीराधा-कृष्ण के प्रेममय संयुक्त स्वरूप का दर्शन करता है, तो वह बार-बार उस पर बलिहार जाता है।

“मेरे मोहन जीवन धन हो”

यह पूरी आरती की सबसे सुंदर भावनाओं में से एक है।

जीवन धन का अर्थ है—जीवन की सबसे मूल्यवान संपत्ति।

भक्त कहता है:

हे मोहन! मेरे जीवन का वास्तविक धन आप हैं। यदि आपका प्रेम और स्मरण मेरे पास है, तो मेरे पास सब कुछ है।

“युगल छवि”

यहाँ राधा-कृष्ण के दिव्य प्रेममय स्वरूप का भाव आता है।

वृंदावन की भक्ति परंपरा में राधा-कृष्ण की युगल उपासना का विशेष महत्व है। इसलिए भक्त केवल कृष्ण के रूप को ही नहीं, बल्कि राधा-कृष्ण के प्रेममय युगल स्वरूप को अपने हृदय में बसाना चाहता है।

“बलि बलि जाऊँ”

इसका भाव है—

हे प्रभु! आपके इस दिव्य स्वरूप पर मैं बार-बार अपना सर्वस्व न्योछावर करता हूँ।


🌷 आरती की अंतिम पंक्ति का भाव

श्री बाँके बिहारी तेरी आरती गाऊँ।

हर अंतरे के बाद यह पंक्ति दोहराना केवल गीत की पुनरावृत्ति नहीं है। यह भक्त के निरंतर समर्पण को दर्शाता है।

भक्त बार-बार कहता है:

“मैं आपकी आरती गाऊँ।”

अर्थात—

  • मेरा मन आपकी ओर रहे।
  • मेरी वाणी आपका नाम ले।
  • मेरी आँखें आपके दर्शन को तरसें।
  • मेरा अहंकार आपके चरणों में झुके।
  • मेरा जीवन आपकी भक्ति में लगे।

🌼 पूरी आरती का समग्र आध्यात्मिक भाव 

“हे बाँके बिहारी! आपका सुंदर रूप मेरे मन को मोह ले, आपके चरणों में मेरा अहंकार मिट जाए, आपका प्रेम मेरे जीवन का धन बन जाए और मेरा जीवन आपके स्मरण एवं भक्ति में सार्थक हो जाए।”

यही इस आरती की सबसे सुंदर आत्मा है—भगवान से कुछ माँगने से अधिक, भगवान को ही अपना सब कुछ मान लेना।


📖 पौराणिक कथा

श्री बाँके बिहारी जी की प्राकट्य-कथा स्वामी हरिदास जी से जुड़ी हुई है।

भक्ति परंपरा के अनुसार, स्वामी हरिदास जी श्रीराधा-कृष्ण के अनन्य भक्त और महान संत थे। वे वृंदावन में निधिवन क्षेत्र में भजन-साधना किया करते थे।

उनकी गहन भक्ति से प्रसन्न होकर श्रीराधा-कृष्ण ने उन्हें दिव्य दर्शन दिए। भक्त-परंपरा में माना जाता है कि श्रीराधा और श्रीकृष्ण का संयुक्त स्वरूप ही श्री बाँके बिहारी जी के रूप में प्रकट हुआ।

इसी कारण बाँके बिहारी जी की उपासना में राधा-कृष्ण के प्रेम को विशेष स्थान प्राप्त है।

यह कथा मुख्यतः वृंदावन की भक्तिपरंपरा और वैष्णव मान्यता पर आधारित है; इसे सामान्य पुराणों में वर्णित ऐतिहासिक घटना के रूप में नहीं समझना चाहिए।


🪔 पूजा विधि

घर पर बाँके बिहारी जी की आरती करते समय सरल विधि अपनाई जा सकती है:

  1. पूजा स्थान को स्वच्छ करें।
  2. श्रीकृष्ण या बाँके बिहारी जी की तस्वीर/प्रतिमा स्थापित करें।
  3. दीपक जलाएँ।
  4. भगवान को पुष्प एवं तुलसी दल अर्पित करें।
  5. चंदन, धूप और नैवेद्य अर्पित करें।
  6. श्रीकृष्ण का ध्यान एवं नाम-स्मरण करें।
  7. “श्री बाँके बिहारी तेरी आरती गाऊँ” का गायन करें।
  8. कपूर अथवा घी के दीपक से आरती करें।
  9. अंत में भगवान से अपनी भूलों के लिए क्षमा माँगें।
  10. प्रसाद वितरित करें।

विशेष: श्रीकृष्ण पूजा में तुलसी को अत्यंत श्रद्धा से अर्पित किया जाता है।


🌼 पूजा सामग्री

  • श्री बाँके बिहारी जी की तस्वीर/प्रतिमा
  • दीपक
  • घी या तेल
  • कपूर
  • धूप/अगरबत्ती
  • फूल
  • तुलसी दल
  • चंदन
  • अक्षत
  • रोली/कुमकुम
  • नैवेद्य या मिठाई
  • फल
  • पंचामृत, यदि अभिषेक करना हो
  • आरती की थाली
  • घंटी

🕉️ श्रीकृष्ण मंत्र

1. महामंत्र

हरे कृष्ण हरे कृष्ण,
कृष्ण कृष्ण हरे हरे।
हरे राम हरे राम,
राम राम हरे हरे॥

2. सरल कृष्ण मंत्र

ॐ कृष्णाय नमः॥

3. बाँके बिहारी स्मरण

जय श्री राधे!
जय श्री बाँके बिहारी लाल!

भक्ति में मंत्र का महत्व केवल उच्चारण में नहीं, बल्कि श्रद्धा और भाव में माना जाता है।


✨ आरती का महत्व

श्री बाँके बिहारी जी की आरती भक्त को भगवान के साथ प्रेमपूर्ण संबंध स्थापित करने की प्रेरणा देती है। आरती में दीपक भगवान के सामने घुमाना इस भावना का प्रतीक माना जाता है कि हम अपने जीवन का प्रकाश भी भगवान को समर्पित करते हैं।

इस आरती का विशेष भाव है:

दर्शन → प्रेम → स्मरण → समर्पण → शांति

नियमित भक्ति से व्यक्ति अपने मन को भगवान के नाम और स्वरूप में लगाने का अभ्यास करता है।


🙏 आरती करने के आध्यात्मिक लाभ

भक्ति-परंपरा में इस प्रकार की आरती और नाम-स्मरण से निम्न आध्यात्मिक लाभ माने जाते हैं:

  • मन को शांति मिलना
  • भगवान के प्रति प्रेम और श्रद्धा बढ़ना
  • सकारात्मक विचारों को बढ़ावा मिलना
  • अहंकार एवं चिंता को प्रभु के चरणों में समर्पित करने की प्रेरणा
  • परिवार में भक्तिमय वातावरण बनना
  • नियमित पूजा की आदत विकसित होना
  • श्रीकृष्ण के नाम और स्वरूप का स्मरण बढ़ना

इन लाभों को आध्यात्मिक और मनोवैज्ञानिक अनुभव के रूप में समझना उचित है, न कि किसी निश्चित सांसारिक परिणाम की गारंटी के रूप में।


🕰️ पूजा का सही समय

श्री बाँके बिहारी जी की आरती के लिए सामान्यतः ये समय शुभ माने जाते हैं:

🌅 प्रातःकाल

स्नान आदि के बाद शांत मन से भगवान का ध्यान और पूजा करना।

🌇 संध्या समय

संध्या दीपक जलाकर आरती करना अत्यंत लोकप्रिय भक्ति-परंपरा है।

🌙 विशेष अवसर

जन्माष्टमी, राधाष्टमी, एकादशी तथा कृष्ण-भक्ति से जुड़े अन्य पर्वों पर विशेष श्रद्धा से आरती की जा सकती है।

घर की पूजा के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात समय से अधिक नियमितता और श्रद्धा है।


💖 प्रेरणादायक संदेश

बाँके बिहारी जी की भक्ति हमें सिखाती है कि भगवान को पाने के लिए केवल बड़े-बड़े अनुष्ठान ही आवश्यक नहीं हैं; सच्चा प्रेम, सरल हृदय और निरंतर स्मरण भी भक्ति का मार्ग है।

जब मन परेशान हो, तो कुछ क्षण भगवान के नाम का स्मरण करें।
जब मन प्रसन्न हो, तो उस प्रसन्नता के लिए भगवान को धन्यवाद दें।
और जब जीवन में कठिनाई आए, तो उसे प्रभु के चरणों में रखकर अपना कर्म करते रहें।

“जिस मन में कृष्ण का स्मरण है, वहाँ आशा का दीप कभी बुझता नहीं।”


❓ FAQ — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

1. श्री बाँके बिहारी जी कौन हैं?

श्री बाँके बिहारी जी वृंदावन में पूजे जाने वाले भगवान श्रीकृष्ण के अत्यंत मनोहर स्वरूप हैं।

2. बाँके बिहारी जी का मंदिर कहाँ है?

श्री बाँके बिहारी मंदिर वृंदावन, उत्तर प्रदेश में स्थित है।

3. “बाँके बिहारी” नाम का क्या अर्थ है?

यह नाम श्रीकृष्ण के मनोहर, त्रिभंगी और आनंदमय स्वरूप से जुड़ा है।

4. क्या घर पर बाँके बिहारी जी की आरती कर सकते हैं?

हाँ। श्रद्धा और स्वच्छता के साथ घर में भगवान श्रीकृष्ण की पूजा और आरती की जा सकती है।

5. बाँके बिहारी जी को क्या चढ़ाया जाता है?

फूल, तुलसी, फल, मिठाई और अन्य सात्त्विक नैवेद्य श्रद्धा से अर्पित किए जा सकते हैं।

6. श्रीकृष्ण का कौन-सा मंत्र जपना चाहिए?

“ॐ कृष्णाय नमः” सरल मंत्र है। कृष्ण भक्त महामंत्र का भी जाप करते हैं।

7. आरती कब करनी चाहिए?

प्रातःकाल या संध्या समय आरती की जा सकती है। नियमितता और श्रद्धा महत्वपूर्ण हैं।

8. क्या आरती के समय घंटी बजा सकते हैं?

हाँ, पूजा-परंपरा के अनुसार आरती के समय घंटी बजाई जाती है।

9. बाँके बिहारी जी की भक्ति में तुलसी का क्या महत्व है?

वैष्णव परंपरा में तुलसी को भगवान विष्णु और कृष्ण की पूजा में अत्यंत पवित्र माना जाता है।

10. बाँके बिहारी जी की आरती का मुख्य भाव क्या है?

मुख्य भाव है—प्रेम, दर्शन, स्मरण और पूर्ण आत्मसमर्पण।


📢 जयघोष

आरती के बाद श्रद्धापूर्वक बोलें:

🦚 बोलो श्री कृष्ण कन्हैया लाल की — जय!
🐄 नंद बाबा के लाल की — जय!
🌸 यशोदा मैया के लाल की — जय!
💙 बाल गोपाल भगवान की — जय!
🌿 ब्रजभूमि बिहारी लाल की — जय!
🪷 वृंदावन बिहारी लाल की — जय!
🙏 श्री राधा कृष्ण भगवान की — जय!
🌺 राधे राधे!

आरती कुंजबिहारी की |  लल्ला की सुन के मै आयी: बधाई भजन | आरती: ॐ जय जगदीश हरे | मधुराष्टकम्: अधरं मधुरं वदनं मधुरं | छोटी छोटी गैया छोटे छोटे ग्वाल – कृष्ण भजन | नन्द के आनंद भयो – जन्माष्टमी भजन |  श्री कृष्णा गोविन्द हरे मुरारी – भजन | श्री कृष्ण चालीसा | आरती बाल कृष्ण की कीजै | अच्चुतम केशवं कृष्ण दामोदरं – भजन | श्री सत्यनारायण जी कथा | श्री राम लला की आरती | रघुवर श्री रामचन्द्र जी की आरती

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