लल्ला की सुन के मै आयी: बधाई भजन (Lalla Ki Sun Ke Mai Aayi)
“लल्ला की सुन के मैं आई, यशोदा मैया दे दो बधाई” श्रीकृष्ण जन्म के उल्लास में गाया जाने वाला प्रसिद्ध बधाई गीत/जन्माष्टमी भजन है। यह भजन उस आनंदमय वातावरण की कल्पना करता है जब नंद भवन में बाल कृष्ण का जन्म होता है और गोकुल की गोपियाँ तथा ब्रज की महिलाएँ यशोदा मैया को बधाई देने आती हैं। गीत में बधाई के साथ नेग और उपहार माँगने की लोक-परंपरा भी दिखाई देती है।
॥ भजन ॥
लल्ला की सुन के मै आयी,
यशोदा मैया देदो बधाई,
कान्हा की सुनके मै आयी,
यशोदा मैया देदो बधाई,
लाला जनम सुन आयी,
यशोदा मैया देदो बधाई ।
देदो बधाई मैया देदो बधाई,
लल्ला की सुन के मै आयी,
यशोदा मैया देदो बधाई ।
टीका भी लूँगी मैया,
बिंदियां भी लूँगी,
रेशम की लूँगी रजाई,
यशोदा मैया देदो बधाई ।
साड़ी भी लूँगी मैया,
लहँगा भी लूँगी,
धोती भी लूँगी मैया,
कुर्ता भी लूँगी,
पगडि की होगी चढ़ाई,
यशोदा मैया देदो बधाई ।
हरवा भी लूँगी मैया,
चुड़ि भी लूँगी,
कंगना पे होगी चढ़ाई,
यशोदा मैया देदो बधाई।
चन्द्र सखी भज,
बाल कृष्ण छवि,
नित नित जाऊँ बलिहारी,
यशोदा मैया देदो बधाई ।
लल्ला की सुन के मै आयी,
यशोदा मैया देदो बधाई,
कान्हा की सुनके मै आयी,
यशोदा मैया देदो बधाई,
लाला जनम सुन आयी,
यशोदा मैया देदो बधाई ।
जय श्री कृष्ण!
राधे राधे!
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हिंदी भावार्थ
भजन की मुख्य भावना है—
“हे यशोदा मैया! आपके घर भगवान श्रीकृष्ण ने जन्म लिया है। उनके जन्म का समाचार सुनकर मैं आपको बधाई देने आई हूँ। यह अवसर इतना आनंदमय है कि मैं आपकी खुशी में सहभागी बनना चाहती हूँ।”
गीत में अलग-अलग प्रकार के वस्त्र, आभूषण और उपहार माँगने की बातें आती हैं। इन्हें केवल सांसारिक वस्तुओं की इच्छा के रूप में नहीं, बल्कि ब्रज की बधाई और नेग की लोक परंपरा के रूप में समझना चाहिए।
मुख्य भाव
- कृष्ण जन्म का आनंद
- यशोदा मैया को बधाई
- बाल कृष्ण के प्रति वात्सल्य
- गोकुल की सामूहिक प्रसन्नता
- नेग और बधाई की ब्रज लोक परंपरा
- बाल कृष्ण के दर्शन की लालसा
- भगवान के प्रति पूर्ण समर्पण
भजन के अंतिम भावों में भक्त बाल कृष्ण की छवि पर निछावर होने और उनके दीर्घ जीवन की मंगलकामना करता है। कुछ प्रचलित पाठों में “चन्द्र सखी” नाम भी आता है, जो भजन की पारंपरिक रचनात्मक छाप मानी जाती है।
पौराणिक कथा
मथुरा के राजा कंस को भविष्यवाणी हुई कि देवकी का आठवाँ पुत्र उसका वध करेगा। इस भय से कंस ने देवकी और वसुदेव को कारागार में बंद कर दिया।
समय आने पर भाद्रपद कृष्ण पक्ष की अष्टमी की रात्रि में श्रीकृष्ण का जन्म हुआ। भगवान के जन्म के बाद वसुदेव उन्हें लेकर गोकुल पहुँचे और नंद बाबा तथा यशोदा मैया के घर बाल कृष्ण का पालन-पोषण हुआ। कृष्ण के गोकुल पहुँचने के बाद ब्रज में आनंद छा गया। नंद भवन में उत्सव हुआ और गोकुलवासियों ने नंद-यशोदा को बधाई दी।
इसी प्रकार के आनंद और बधाई के लोक वातावरण को यह गीत भावपूर्ण ढंग से प्रस्तुत करता है।
पूजा विधि
बाल कृष्ण की पूजा सरल और प्रेमपूर्वक की जा सकती है।
पूजा की सरल विधि
- पूजा स्थान को साफ करें।
- बाल गोपाल या श्रीकृष्ण की मूर्ति/चित्र स्थापित करें।
- दीपक और धूप जलाएँ।
- भगवान को स्वच्छ जल या पंचामृत से स्नान कराएँ, यदि आपकी पूजा-पद्धति में यह परंपरा हो।
- सुंदर वस्त्र और आभूषण अर्पित करें।
- चंदन, अक्षत और पुष्प अर्पित करें।
- तुलसी दल अर्पित करें।
- माखन-मिश्री, फल या अन्य सात्त्विक भोग लगाएँ।
- “लल्ला की सुन के मैं आई” बधाई गीत गाएँ।
- अंत में आरती करके प्रसाद वितरित करें।
सबसे महत्वपूर्ण बात श्रद्धा और प्रेम है।
पूजा सामग्री
- बाल गोपाल की मूर्ति या श्रीकृष्ण का चित्र
- पीला/स्वच्छ वस्त्र
- चंदन
- अक्षत
- पुष्प
- तुलसी दल
- धूप
- दीपक
- घी या तेल
- माखन-मिश्री
- फल
- पंचामृत
- नैवेद्य
- घंटी
- आरती की थाली
जन्माष्टमी के अवसर पर झूला, मुकुट, बांसुरी और बाल गोपाल के श्रृंगार की सामग्री भी रखी जा सकती है।
श्रीकृष्ण मंत्र
सरल मंत्र
ॐ कृष्णाय नमः।
बाल गोपाल मंत्र
ॐ देवकीनन्दनाय नमः।
गोपाल मंत्र
ॐ गोपालाय नमः।
कृष्ण महामंत्र
हरे कृष्ण हरे कृष्ण,
कृष्ण कृष्ण हरे हरे।
हरे राम हरे राम,
राम राम हरे हरे॥
इन मंत्रों का जाप श्रद्धा और एकाग्रता से किया जा सकता है।
भजन का महत्व
“लल्ला की सुन के मैं आई” केवल कृष्ण जन्म की बधाई देने वाला गीत नहीं है, बल्कि यह ब्रज की लोक-संस्कृति और कृष्ण भक्ति का सुंदर उदाहरण है। इसमें भक्त भगवान को दूर बैठे ईश्वर के रूप में नहीं, बल्कि अपने घर के प्यारे बालक के रूप में अनुभव करता है।
भजन में यशोदा मैया से बधाई और नेग माँगने का प्रसंग ब्रज की पारंपरिक उत्सव संस्कृति को दर्शाता है। इसी कारण यह भजन विशेष रूप से जन्माष्टमी, कृष्ण जन्मोत्सव, नंदोत्सव और बाल कृष्ण के बधाई कार्यक्रमों में लोकप्रिय है।
भजन सुनने और गाने के लाभ
भक्ति की दृष्टि से इस भजन का नियमित गायन या श्रवण:
- मन में प्रसन्नता और भक्ति का भाव जगाता है।
- श्रीकृष्ण के बाल स्वरूप का ध्यान करने में सहायता करता है।
- परिवार में सामूहिक भक्ति का वातावरण बनाता है।
- बच्चों को कृष्ण की बाल लीलाओं और भारतीय संस्कृति से जोड़ता है।
- मन को सकारात्मक और आनंदपूर्ण भावों की ओर ले जाता है।
- जन्माष्टमी के उत्सव में भक्तिभाव को बढ़ाता है।
इन लाभों को आध्यात्मिक और भावनात्मक दृष्टि से समझना चाहिए; इन्हें निश्चित सांसारिक परिणाम की गारंटी नहीं माना जाना चाहिए।
पूजा और भजन का सही समय
इस भजन के लिए कोई एक अनिवार्य समय नहीं है।
विशेष अवसर
श्रीकृष्ण जन्माष्टमी:
रात्रि में कृष्ण जन्म के समय विशेष रूप से बधाई गीत गाए जाते हैं।
नंदोत्सव:
कृष्ण जन्म के अगले दिन बधाई और उत्सव के रूप में इसे गाया जा सकता है।
प्रातःकाल:
बाल गोपाल की दैनिक पूजा और श्रृंगार के समय।
सायंकाल:
परिवार के साथ भजन-कीर्तन के समय।
विशेष कृष्ण जन्मोत्सव:
मंदिर, घर या सत्संग में कृष्ण जन्म की कथा के बाद।
प्रेरणादायक संदेश
श्रीकृष्ण का बाल स्वरूप हमें सिखाता है कि ईश्वर के साथ संबंध केवल भय या औपचारिक पूजा का नहीं, बल्कि प्रेम, अपनापन और वात्सल्य का भी हो सकता है। जिस प्रकार ब्रजवासियों ने कृष्ण को अपने परिवार के सदस्य की तरह प्रेम किया, उसी प्रकार भक्त भी अपने हृदय में भगवान को स्थान दे सकता है।
जब मन में प्रेम हो, तो छोटी-सी पूजा भी बड़ी भक्ति बन जाती है।
इस भजन का संदेश है कि भगवान के जन्म का उत्सव केवल बाहर नहीं, बल्कि हमारे मन-मंदिर में भी आनंद का जन्म कराए।
FAQ – अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
प्रश्न 1: “लल्ला की सुन के मैं आई” किस भगवान का भजन है?
यह भगवान श्रीकृष्ण के बाल स्वरूप से संबंधित प्रसिद्ध बधाई गीत है।
प्रश्न 2: इस भजन में “लल्ला” किसे कहा गया है?
“लल्ला” से आशय बाल श्रीकृष्ण अर्थात यशोदा मैया के नंदलाल से है।
प्रश्न 3: यह भजन कब गाया जाता है?
मुख्य रूप से जन्माष्टमी, कृष्ण जन्मोत्सव और नंदोत्सव के अवसर पर गाया जाता है।
प्रश्न 4: क्या इसे घर पर गाया जा सकता है?
हाँ। इसे बाल गोपाल की पूजा, श्रृंगार या पारिवारिक भजन-कीर्तन के समय गाया जा सकता है।
प्रश्न 5: क्या इस भजन के लिए विशेष पूजा सामग्री आवश्यक है?
नहीं। सामान्य कृष्ण पूजा सामग्री पर्याप्त है। प्रेम और श्रद्धा सबसे महत्वपूर्ण हैं।
प्रश्न 6: बाल कृष्ण को कौन-सा भोग लगाया जाता है?
माखन-मिश्री, दूध, दही, फल, मिठाई और अन्य सात्त्विक नैवेद्य अर्पित किए जा सकते हैं।
प्रश्न 7: क्या इस भजन को जन्माष्टमी की रात गा सकते हैं?
हाँ। कृष्ण जन्म के समय और उसके बाद बधाई गीत के रूप में गाया जा सकता है।
प्रश्न 8: भजन में वस्त्र और आभूषण माँगने का क्या अर्थ है?
यह ब्रज की बधाई और नेग की लोक परंपरा का हिस्सा है। इसे उत्सव, प्रेम और खुशी की अभिव्यक्ति के रूप में समझना उचित है।
प्रश्न 9: “चन्द्र सखी” का क्या अर्थ है?
कुछ प्रचलित पाठों में “चन्द्र सखी” नाम आता है। पारंपरिक भजनों में ऐसी पंक्तियाँ रचनाकार या भक्त की पहचान/छाप के रूप में भी आती हैं।
प्रश्न 10: क्या बच्चों को यह भजन सिखाया जा सकता है?
बिल्कुल। यह बाल कृष्ण के जन्म और ब्रज के उत्सव से जुड़ा सरल भक्तिपूर्ण गीत है, इसलिए बच्चों के लिए भी उपयुक्त है।
जयघोष
पूजा या भजन के अंत में श्रद्धापूर्वक बोलें—
बोलो श्री कृष्ण भगवान की जय!
अच्युत भगवान की जय!
नंद के आनंद भयो, जय कन्हैया लाल की!
यशोदा मैया की जय!
लड्डू गोपाल की जय!
श्री राधा रानी की जय!
बांके बिहारी लाल की जय!
वृंदावन धाम की जय!
भक्त मीरा की जय!
जय श्री कृष्ण! राधे-राधे!
आरती कुंजबिहारी की | आरती: ॐ जय जगदीश हरे | मधुराष्टकम्: अधरं मधुरं वदनं मधुरं | छोटी छोटी गैया छोटे छोटे ग्वाल – कृष्ण भजन | नन्द के आनंद भयो – जन्माष्टमी भजन | श्री कृष्णा गोविन्द हरे मुरारी – भजन | आओ भोग लगाओ प्यारे मोहन – भोग आरती | श्री बांके बिहारी तेरी आरती गाऊं | श्री कृष्ण चालीसा | आरती बाल कृष्ण की कीजै | अच्चुतम केशवं कृष्ण दामोदरं – भजन | श्री सत्यनारायण जी कथा | श्री राम लला की आरती | रघुवर श्री रामचन्द्र जी की आरती
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