श्री शिवताण्डवस्तोत्रम् (Shri Shiv Tandva Stotram)
श्री शिवताण्डवस्तोत्र भगवान शिव की महिमा का वर्णन करने वाला एक अत्यंत प्रभावशाली एवं दिव्य संस्कृत स्तोत्र है। इसकी रचना लंकेश्वर रावण द्वारा की गई मानी जाती है। पौराणिक कथा के अनुसार जब रावण ने अपने बल के अभिमान में कैलाश पर्वत को उठाने का प्रयास किया, तब भगवान शिव ने अपने चरण के अंगूठे से पर्वत को दबा दिया। रावण पर्वत के नीचे फँस गया और हजारों वर्षों तक भगवान शिव की स्तुति में यह अद्भुत स्तोत्र गाया। उसकी भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उसे मुक्त किया तथा अनेक वरदान प्रदान किए।
इस स्तोत्र में भगवान शिव के रौद्र, करुणामय, वैराग्यपूर्ण एवं विश्वकल्याणकारी स्वरूप का अत्यंत सुंदर काव्यात्मक वर्णन मिलता है। इसका नियमित पाठ भक्तों में आत्मबल, साहस, श्रद्धा तथा आध्यात्मिक चेतना का संचार करता है।
॥ श्री शिवताण्डवस्तोत्रम् ॥
जटाटवीगलज्जलप्रवाहपावितस्थले
गलेऽवलम्ब्य लम्बितां भुजङ्गतुङ्गमालिकाम्।
डमड्डमड्डमड्डमन्निनादवड्डमर्वयं
चकार चण्डताण्डवं तनोतु नः शिवः शिवम्॥१॥
जटाकटाहसम्भ्रमभ्रमन्निलिम्पनिर्झरी-
विलोलवीचिवल्लरीविराजमानमूर्धनि।
धगद्धगद्धगज्ज्वलल्ललाटपट्टपावके
किशोरचन्द्रशेखरे रतिः प्रतिक्षणं मम॥२॥
धराधरेन्द्रनन्दिनीविलासबन्धुबन्धुर-
स्फुरद्दिगन्तसन्ततिप्रमोदमानमानसे।
कृपाकटाक्षधोरणीनिरुद्धदुर्धरापदि
क्वचिद्दिगम्बरे मनो विनोदमेतु वस्तुनि॥३॥
जटाभुजङ्गपिङ्गलस्फुरत्फणामणिप्रभा-
कदम्बकुङ्कुमद्रवप्रलिप्तदिग्वधूमुखे।
मदान्धसिन्धुरस्फुरत्त्वगुत्तरीयमेदुरे
मनो विनोदमद्भुतं बिभर्तु भूतभर्तरि॥४॥
सहस्रलोचनप्रभृत्यशेषलेखशेखर-
प्रसूनधूलिधोरणी विधूसराङ्घ्रिपीठभूः।
भुजङ्गराजमालया निबद्धजाटजूटकः
श्रिये चिराय जायतां चकोरबन्धुशेखरः॥५॥
ललाटचत्वरज्वलद्धनञ्जयस्फुलिङ्गभा-
निपीतपञ्चसायकं नमन्निलिम्पनायकम्।
सुधामयूखलेखया विराजमानशेखरं
महाकपालिसम्पदे शिरोजटालमस्तु नः॥६॥
करालभालपट्टिकाधगद्धगद्धगज्ज्वल-
द्धनञ्जयाहुतीकृतप्रचण्डपञ्चसायके।
धराधरेन्द्रनन्दिनीकुचाग्रचित्रपत्रक-
प्रकल्पनैकशिल्पिनि त्रिलोचने रतिर्मम॥७॥
नवीनमेघमण्डली निरुद्धदुर्धरस्फुरत्-
कुहूनिशीथिनीतमः प्रबन्धबद्धकन्धरः।
निलिम्पनिर्झरीधरस्तनोतु कृत्तिसिन्धुरः
कलानिधानबन्धुरः श्रियं जगद्धुरन्धरः॥८॥
प्रफुल्लनीलपङ्कजप्रपञ्चकालिमप्रभा-
वलम्बिकण्ठकन्दलीरुचिप्रबद्धकन्धरम्।
स्मरच्छिदं पुरच्छिदं भवच्छिदं मखच्छिदं
गजच्छिदान्धकच्छिदं तमन्तकच्छिदं भजे॥९॥
अखर्वसर्वमङ्गलाकलाकदम्बमञ्जरी-
रसप्रवाहमाधुरी विजृम्भणामधुव्रतम्।
स्मरान्तकं पुरान्तकं भवान्तकं मखान्तकं
गजान्तकान्धकान्तकं तमन्तकान्तकं भजे॥१०॥
जयत्वदभ्रविभ्रमभ्रमद्भुजङ्गमश्वस-
द्विनिर्गमत्क्रमस्फुरत्करालभालहव्यवाट्।
धिमिद्धिमिद्धिमिध्वनन्मृदङ्गतुङ्गमङ्गल-
ध्वनिक्रमप्रवर्तितप्रचण्डताण्डवः शिवः॥११॥
दृषद्विचित्रतल्पयोर्भुजङ्गमौक्तिकस्रजोर्-
गरिष्ठरत्नलोष्ठयोः सुहृद्विपक्षपक्षयोः।
तृणारविन्दचक्षुषोः प्रजामहीमहेन्द्रयोः
समप्रवृत्तिकः कदा सदाशिवं भजाम्यहम्॥१२॥
कदा निलिम्पनिर्झरीनिकुञ्जकोटरे वसन्
विमुक्तदुर्मतिः सदा शिरःस्थमञ्जलिं वहन्।
विमुक्तलोललोचनो ललामभाललग्नकः
शिवेति मन्त्रमुच्चरन् कदा सुखी भवाम्यहम्॥१३॥
इमं हि नित्यमेवमुक्तमुत्तमोत्तमं स्तवं
पठन्स्मरन्ब्रुवन्नरो विशुद्धिमेति सन्ततम्।
हरे गुरौ सुभक्तिमाशु याति नान्यथा गतिं
विमोहनं हि देहिनां सुशङ्करस्य चिन्तनम्॥१४॥
पूजावसानसमये दशवक्त्रगीतं
यः शम्भुपूजनपरं पठति प्रदोषे।
तस्य स्थिरां रथगजेन्द्रतुरङ्गयुक्तां
लक्ष्मीं सदैव सुमुखीं प्रददाति शम्भुः॥१५॥
॥ इति श्री शिवताण्डवस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥
शिव आरती | लिङ्गाष्टकम् | शिव पंचाक्षर स्तोत्र | शिव चालीसा | द्वादश ज्योतिर्लिंग मंत्र | श्री शिव स्तुति – श्री गिरजापति वंदिकर
श्री शिवताण्डवस्तोत्र का हिंदी भावार्थ
श्लोक 1 का भावार्थ
जटाटवीगलज्जलप्रवाहपावितस्थले…
भगवान शिव की विशाल जटाओं से गंगा का पवित्र जल निरंतर प्रवाहित हो रहा है। उनके गले में विशाल सर्पों की माला शोभायमान है। डमरू की गूंजती ध्वनि के साथ वे अद्भुत ताण्डव नृत्य कर रहे हैं। ऐसे कल्याणकारी शिव हमारे जीवन में मंगल और सुख प्रदान करें।
श्लोक 2 का भावार्थ
जटाकटाहसम्भ्रम…
भगवान शिव की जटाओं में स्वर्ग से उतरती गंगा की लहरें लहराती हुई अत्यंत सुंदर प्रतीत होती हैं। उनके मस्तक पर प्रज्वलित तीसरा नेत्र अग्नि के समान तेजस्वी है और उस पर सुशोभित अर्धचंद्र उनकी दिव्यता को और बढ़ाता है। मेरा मन सदा ऐसे शिव में ही रमण करे।
श्लोक 3 का भावार्थ
धराधरेन्द्रनन्दिनी…
भगवान शिव माता पार्वती के साथ आनंदपूर्वक विराजमान हैं। उनकी करुणामयी दृष्टि भक्तों के बड़े से बड़े संकटों को दूर कर देती है। वे दिगम्बर रूप में समस्त संसार के कल्याण के लिए सदैव तत्पर रहते हैं।
श्लोक 4 का भावार्थ
जटाभुजङ्गपिङ्गल…
भगवान शिव की जटाओं में सुशोभित सर्पों के मणियों का तेज चारों दिशाओं को प्रकाशित कर रहा है। उनके शरीर पर भस्म, व्याघ्रचर्म और दिव्य आभूषण उनकी अद्वितीय तपस्या एवं वैराग्य का प्रतीक हैं। ऐसे भूतनाथ में मेरा मन सदैव आनंद का अनुभव करे।
श्लोक 5 का भावार्थ
सहस्रलोचनप्रभृत्य…
इन्द्र सहित सभी देवता भगवान शिव के चरणों की पूजा करते हैं और पुष्प अर्पित करते हैं। उनके सिर पर सर्पों की माला तथा मस्तक पर चन्द्रमा उनकी अलौकिक महिमा का प्रतीक है। ऐसे चन्द्रशेखर भगवान शिव सदा हमारा कल्याण करें।
श्लोक 6 का भावार्थ
ललाटचत्वरज्वलत्…
भगवान शिव के ललाट की अग्नि ने कामदेव का दहन कर दिया। उनके मस्तक पर सुशोभित चन्द्रमा उनकी शीतल करुणा का प्रतीक है। वे महाकाल स्वरूप होकर भी भक्तों पर अत्यंत दयालु हैं।
श्लोक 7 का भावार्थ
करालभालपट्टिका…
भगवान शिव के तीसरे नेत्र की प्रचंड अग्नि समस्त अधर्म का नाश करने वाली है। माता पार्वती के प्रिय भगवान शिव त्रिलोचन हैं और समस्त सृष्टि के रक्षक हैं। मेरा मन सदैव उनके चरणों में लगा रहे।
श्लोक 8 का भावार्थ
नवीनमेघमण्डली…
भगवान शिव का स्वरूप नवीन वर्षा-ऋतु के बादलों की भाँति गंभीर और तेजस्वी है। वे गंगा को धारण करने वाले, समस्त जगत के आधार और कल्याणकारी हैं। वे संसार को समृद्धि और मंगल प्रदान करें।
श्लोक 9 का भावार्थ
प्रफुल्लनीलपङ्कज…
मैं उन भगवान शिव की उपासना करता हूँ जिन्होंने कामदेव, त्रिपुरासुर, संसार के दुःख, यज्ञ-विघ्न, गजासुर, अंधकासुर तथा मृत्यु के भय का भी नाश किया। वे सभी प्रकार के संकटों का अंत करने वाले हैं।
श्लोक 10 का भावार्थ
अखर्वसर्वमङ्गला…
भगवान शिव सभी मंगलों के स्रोत हैं। वे प्रेम, आनंद और करुणा से परिपूर्ण हैं। वे समस्त पापों और अहंकार का नाश कर भक्तों को मोक्ष का मार्ग प्रदान करते हैं।
श्लोक 11 का भावार्थ
जयत्वदभ्रविभ्रम…
भगवान शिव के ताण्डव नृत्य के समय डमरू की दिव्य ध्वनि सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में गूंजती है। उनके मस्तक की अग्नि और ताण्डव की गति सृष्टि, पालन और संहार के शाश्वत चक्र का प्रतीक है।
श्लोक 12 का भावार्थ
दृषद्विचित्रतल्पयोः…
सच्चा शिवभक्त सुख-दुःख, मित्र-शत्रु, सोना-पत्थर, राजा-प्रजा—सबको समान दृष्टि से देखता है। भगवान शिव हमें समभाव, वैराग्य और आत्मसंयम का संदेश देते हैं।
श्लोक 13 का भावार्थ
कदा निलिम्पनिर्झरी…
कवि भगवान शिव से प्रार्थना करते हैं कि कब उन्हें ऐसा सौभाग्य मिलेगा जब वे कैलाश के समीप निवास कर, हाथ जोड़कर “शिव-शिव” का निरंतर जप करते हुए परम आनंद और मुक्ति प्राप्त करेंगे।
श्लोक 14 का भावार्थ
इमं हि नित्यमेव…
जो व्यक्ति इस श्रेष्ठ शिवताण्डव स्तोत्र का प्रतिदिन श्रद्धा से पाठ, स्मरण या श्रवण करता है, उसका मन शुद्ध होता है और भगवान शिव तथा गुरु के प्रति उसकी भक्ति दृढ़ होती है। शिव का चिंतन मनुष्य को मोह और अज्ञान से मुक्त करता है।
श्लोक 15 का भावार्थ
पूजावसानसमये…
जो भक्त भगवान शिव की पूजा के अंत में, विशेष रूप से प्रदोष काल में, श्रद्धापूर्वक शिवताण्डव स्तोत्र का पाठ करता है, उस पर भगवान शिव प्रसन्न होकर स्थायी सुख, समृद्धि, ऐश्वर्य और मंगलमय जीवन का आशीर्वाद प्रदान करते हैं।
समग्र भावार्थ
शिवताण्डवस्तोत्र भगवान शिव के अद्भुत ताण्डव, उनके अनंत तेज, वैराग्य, करुणा और विश्वकल्याणकारी स्वरूप का दिव्य वर्णन है। यह स्तोत्र हमें सिखाता है कि भगवान शिव केवल संहार के देव नहीं, बल्कि सृष्टि के संतुलन, करुणा, आत्मज्ञान और मोक्ष के भी अधिष्ठाता हैं। श्रद्धापूर्वक इसका पाठ करने से मन में भक्ति, साहस, आत्मविश्वास और आध्यात्मिक शांति का संचार होता है तथा व्यक्ति शिवतत्त्व के निकट पहुँचने का प्रयास करता है।
पौराणिक कथा
एक बार लंका के राजा रावण ने अपने पराक्रम के अभिमान में कैलाश पर्वत उठाने का प्रयास किया। भगवान शिव ने अपने पैर के अंगूठे से पर्वत दबा दिया, जिससे रावण पर्वत के नीचे दब गया।
हजारों वर्षों तक उसने भगवान शिव की आराधना करते हुए इस दिव्य स्तोत्र का गायन किया। उसकी निष्ठा और भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उसे मुक्त किया तथा चन्द्रहास नामक दिव्य तलवार का वरदान दिया।
इसी घटना से शिवताण्डवस्तोत्र की उत्पत्ति मानी जाती है।
पूजा विधि
- प्रातः स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
- भगवान शिव अथवा शिवलिंग के समक्ष दीपक जलाएँ।
- गंगाजल से अभिषेक करें।
- पंचामृत अर्पित करें।
- बिल्वपत्र, धतूरा एवं पुष्प चढ़ाएँ।
- धूप-दीप अर्पित करें।
- “ॐ नमः शिवाय” मंत्र का जप करें।
- श्रद्धापूर्वक शिवताण्डवस्तोत्र का पाठ करें।
- अंत में शिव आरती एवं प्रसाद वितरण करें।
पूजा सामग्री
- शिवलिंग / शिव प्रतिमा
- गंगाजल
- स्वच्छ जल
- पंचामृत
- बिल्वपत्र
- धतूरा
- आक के पुष्प
- सफेद पुष्प
- चंदन
- अक्षत
- धूप
- दीपक
- कपूर
- रुद्राक्ष
- फल एवं नैवेद्य
प्रमुख मंत्र
पंचाक्षरी मंत्र
ॐ नमः शिवाय॥
महामृत्युंजय मंत्र
ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।
उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥
शिव गायत्री मंत्र
ॐ तत्पुरुषाय विद्महे
महादेवाय धीमहि
तन्नो रुद्रः प्रचोदयात्॥
शिवताण्डवस्तोत्र का महत्व
- भगवान शिव की विशेष कृपा प्राप्त होती है।
- आध्यात्मिक चेतना जागृत होती है।
- आत्मविश्वास एवं साहस बढ़ता है।
- मन एकाग्र होता है।
- शिवभक्ति दृढ़ होती है।
- नकारात्मक विचारों का प्रभाव कम होता है।
- जीवन में धैर्य और संतुलन आता है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार लाभ
श्रद्धा और भक्ति से इस स्तुति का पाठ करने पर भक्तों का विश्वास है कि—
- मानसिक शांति प्राप्त होती है।
- भय एवं चिंता कम होती है।
- आत्मबल में वृद्धि होती है।
- सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।
- शिव कृपा से जीवन में शुभता आती है।
- आध्यात्मिक उन्नति होती है।
- नियमित पाठ से मन में भक्ति एवं वैराग्य का विकास होता है।
नोट: ये लाभ धार्मिक आस्था और परंपराओं पर आधारित हैं। इन्हें किसी निश्चित सांसारिक या चिकित्सीय परिणाम की गारंटी नहीं माना जाना चाहिए।
पाठ का सही समय
- 🌅 ब्रह्म मुहूर्त
- 🌄 सूर्योदय के बाद
- 🌙 प्रदोष काल
- 🕉️ प्रत्येक सोमवार
- 🌿 श्रावण मास
- 🔱 महाशिवरात्रि
- 🐍 नाग पंचमी
- 🌑 मासिक शिवरात्रि
प्रेरणादायक संदेश
“भगवान शिव का ताण्डव हमें यह सिखाता है कि परिवर्तन ही जीवन का शाश्वत नियम है। अहंकार का अंत और भक्ति का आरंभ ही आत्मज्ञान का मार्ग है। जो श्रद्धा, संयम और सत्य के साथ ‘ॐ नमः शिवाय’ का स्मरण करता है, उसके जीवन में साहस, शांति और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।”
FAQ (अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न)
1. शिवताण्डवस्तोत्र के रचयिता कौन हैं?
परंपरा के अनुसार इसकी रचना लंका के राजा रावण ने की थी।
2. शिवताण्डवस्तोत्र का पाठ कब करना चाहिए?
सोमवार, प्रदोष, महाशिवरात्रि, श्रावण मास तथा प्रतिदिन प्रातः या सायंकाल इसका पाठ किया जा सकता है।
3. क्या महिलाएँ इसका पाठ कर सकती हैं?
हाँ, श्रद्धा और शुद्ध भाव से कोई भी भक्त इसका पाठ कर सकता है।
4. क्या इसका पाठ संस्कृत में ही करना आवश्यक है?
संस्कृत में पाठ श्रेष्ठ माना जाता है, लेकिन अर्थ समझकर श्रद्धा से पाठ करना भी अत्यंत लाभकारी है।
5. क्या शिवताण्डवस्तोत्र का पाठ शिवलिंग के सामने करना चाहिए?
यदि संभव हो तो शिवलिंग या भगवान शिव की प्रतिमा के समक्ष करें, अन्यथा मन में शिव का ध्यान करके भी किया जा सकता है।
6. क्या नाग पंचमी पर इसका विशेष महत्व है?
हाँ, नाग पंचमी भगवान शिव एवं नागों से संबंधित पावन पर्व है। इस दिन शिवताण्डवस्तोत्र का पाठ अत्यंत शुभ माना जाता है।
7. क्या इससे भय दूर होता है?
धार्मिक मान्यता है कि श्रद्धा से पाठ करने पर मानसिक भय, नकारात्मकता और अस्थिरता कम होती है तथा आत्मबल बढ़ता है।
8. क्या विद्यार्थी इसका पाठ कर सकते हैं?
हाँ, यह स्तोत्र एकाग्रता, आत्मविश्वास और सकारात्मक सोच विकसित करने में प्रेरक माना जाता है।
॥ जयघोष:॥
🔱 हर हर महादेव!
🔱 बोलो भोलेनाथ शंकर भगवान की जय!
🔱 जय शिव शंकर!
🔱 ॐ नमः शिवाय!
🔱 बाबा विश्वनाथ की जय!
🔱 कैलाशपति महादेव की जय!
🔱 त्रिपुरारी महादेव की जय!
🔱 नीलकंठ महादेव की जय!
Be the first to comment